Monday, August 21, 2023

                                                 एक लिखित संविधान; आईये पढ़ते है!

राजेंद्र भारतीय

Preamble: It is necessary to state at the onset, why the need to undertake this exercise arose. There are two reasons for this; one is that the set of persons chosen to write the draft for the Indian Constitution did not have any concept of sovereignty and second is an unforgivable, singular omission of the word Indian from the whole of the Constitution.

सबसे पहले तो जैसा अक्षरशः लिखा गया है और जो उस लिखे गये संविधान  का प्रचलित interpretation है, वो व्यक्त करता हूँ, फिर उसका देश की संप्रभुता पर क्या असर हुआ पड़ा है, वो बताऊंगा,

सारे 24X7 newscasters, बड़े बड़े वकील, राजनेता और सुप्रीमकोर्ट भी जिसे बड़े आदरपूर्वक The Indian Constitution कह कर संबोधित करती है उसकी वास्तविकता यह है की शब्द Indian जो कि हमारी identity एवं nationality (citizenship too) दर्शाता है, (which is both; automatic and inalienable) वो ना केवल संविधान के शीर्षक से, बल्कि उसके विश्व के विशालतम गद्ध(text) से भी गायब है. अब देखते है कि इस एक शब्द के omission के परिणाम क्या हुए हैं!

लेकिन Indian शब्द के संविधान से गायब होने के परिणाम से पहले एक नज़र उसमें किये गये कुछ Disabling provisions पर भी डाल लेते है. मात्र दो original Article है संविधान में; एक में राष्ट्रपति और दुसरे में उपराष्ट्रपति के पद के लिये Qualification Ratings दी गई है: Art 58 और Art 66. चूँकि ये QRs देश के सर्वोच्च पदों के लिये दी गई है, इसलिये यह माना जा सकता है ये QR कमोबेश सभी संवैधानिक पदों के लिए लागू  होगी. उन्ही में से जो शब्द उपयोग किये गए है वे ये है “No person shall be eligible for election as President unless, he is a citizen of India”. अब अंग्रेजी व्याकरण के अनुसार तो यह QR तो किसी को रोकने के लिए लिखी गई है. यानि किसी ऐसे व्यक्ति को रोकने के लिये, जो सामान्यतः भारत में नहीं पाया जाता है! अब मुझे कोई ये बताये कि जब देश में लगभग सौ प्रतिशत भारतीय है, जो की स्वाभाविक रूप से और स्वतः ही भारत के नागरिक भी है, यह प्रावधान, वो भी ऐसी भाषा में जहाँ इसका उल्लंघन सोचा भी नहीं जा सकता, वो किसे रोकने के लिये किया गया था! जाहिर है, किसी भी विदेशी व्यक्ति को. अब चूँकि संविधान से Indian ही ग़ायब है और Art 9 के अनुसार, एक भारतीय भी  यहाँ का नागरिक नहीं है, अगर वो स्वेच्छा से किसी विदेशी राष्ट्र की नागरिकता स्वीकार कर चूका हो. तब क्या? यह प्रावधान केवल उन भारतीय व्यक्तियों पर लागू होगा, जो जीविका अर्जन के लिए किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण किये हो. और चूँकि भारत पर लगभग 150 वर्षों तक शासन करने के बाद, अंग्रेजों ने केवल उन अंग्रजों के लिये, जो स्वतंत्र भारत में ही रहते रहना चाहते हो, उनके लिए जो कानून, The Foreigners’ Act, 1946, जिसमें एक विदेशी की परिभाषा यह दी हो: Any person, who is not a citizen of India, उसे मात्र एक राजनीतिक दल के लम्बे शासन के कारण संविधान से भी ऊपर रखकर भारत से सारे भारतीयों/Indians को ही भारत से गायब माना जाये! (प्रधानमंत्रीजी जब सैकड़ों पुराने कानून रद्द करने की बात करते है, तो ये Act जिसे ab initio void होना चाहिये था, क्यों अभी भी यह निर्धारित करने के लिये कि कौन विदेशी है यानि यह मानते हुए की यदि कोई विदेशी यहाँ की नागरिकता को स्वीकार करने की कृपा करता है तो वो इस Act में दी गई परिभाषा के अनुसार  ‘विदेशी ना होकर एक विदेशी मूल का व्यक्ति बन जाता है.

अगला अध्याय संविधान का है: Part II: Citizenship (यहाँ यह बताना आवश्यक है कि किसी भी देश में Nationality (Citizenship is a synonym, but not same) वो अधिकार है जो मनुष्य को पैदा होने से हि प्राप्त हो जाता है और किसी भी legislation का विषय नहीं है. Art 15 of the UN’s Universal Declaration of Human Rights को, जिसे उसी समय जब देश के लिये संविधान लिखा जा रहा था (Dec 1948) में पारित किया गया था, और इसलिये उसके लेखकों को उसका संज्ञान लेते हुए इस अध्याय को जो विभाजन से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिये अंग्रेजी और संप्रभुता(sovereignty) दोनों की कोई समझ के बिना शामिल किया गया था, delete कर देना चाहिये था. लेकिन अभी दोनों बाते जहाँ की तहां है; एक तो भारत में कोई भारतीय(Indian) नहीं है, दूसरा भारत की कोई nationality हि नहीं है, मात्र citizenship है, वो भी Part II के अनुसार.

सारांश में, वस्तुस्थिति यह है की भारत में केवल एक जन्म से ही भारतीय/Indian जो है, केवल उसे हि  किसी संवैधानिक पद से वंचित किया जा सकता है, जैसे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पोते को EC ने एक विधान सभा चुनाव लड़ने से debar किया था 14 अप्रैल 2004 के दिन. बाकि तो दुनिया के किसी कौने से आये व्यक्ति को जो भारत की नागरिकता स्वीकार करने का हमारे पर उपकार करे उसका स्वागत है.

 संविधान का इससे अधिक absurd interpretation सोचा भी नहीं जा सकता है. इसलिये, आइये कुछ हि दिनों में जिन माननीय राष्ट्रपतिजी के जन्मदिन को हम ‘शिक्षक दिवस के रूप में मनाते है, उनके द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के शताब्दी समारोह (Aug 1962) के अवसर पर दिए गये अभिभाषण का वो भाग जिसमें उन्होंने Sovereignty शब्द को बहुत सुन्दरता से समझाया है, उसे पढ़ लिया जाये. उस अभिभाषण का वो अंश, जो संप्रभुता को पूर्ण रूप में दर्शाता है, वो ये है-  Atmaupamyena Sarvtra, Atmana Pratikulani,paresam na samacarat.” The essential principles of this are those I feel are found in Kant’s Categorical Imperative. He put it in three different ways. Always act in such a manner that the principle of your action can become a general law. The second formulation was, treat every human being as an end in himself and never as a means. The third was, each human individual is both a sovereign and a subject. He gave three varied expressions to the one fundamental principle of equality of all persons in law. He makes out that you should not act on a principle which cannot become universal. If you steal and everybody steals, what you attain by theft will not be retained by you. He made out that no man should be treated as a slave. Each man is an end in himself. He also said, sovereignty consists in subjection to law. You cannot be free unless you exercise some kind of control over yourself. So, freedom and control, freedom and subjection to law go together and these are the principles of any sound system of dharma or law.”

संक्षेप में, प्रत्येक भारतीय संप्रभुता का एक अभिन्न अंग है, इसलिये किसी भी  कानून में उसे मात्र एक नागरिक के स्तर पर नहीं reduce किया जा सकता है.


No comments:

Post a Comment